Welcome to Dairy Health and Nutrition Initiative India Foundation
राजस्थान में शहरों की आबोहवा से कोसों दूर बसे गांव, जहां गर्मी की दोपहर में एयर कंडीश्नर एक ख्बाव जैसा है, तेज दोपहरी में ऐसा सन्नाटा पसरा रहता है कि परिंदे भी हरे पत्तों में दुबक जाते हैं
ऐसे में गांव के कुछ लोग परेशान हैं कि उनकी पड़ोसन गीता देवी किसी अजनबी पुरुष के साथ रोज-रोज कहां जाती है? कौन है, जो उसे बाइक पर बिठाकर रेत में डूबे रास्तों पर धूल उड़ाता हुआ निकल जाता है? गीता देवी ऐसे सवाल उठाती नजरों से अनजान नहीं थी, लेकिन उसके पक्के इरादे अंगद के उन पांवों की तरह अडिग थे, जिसे रावण की विशाल राक्षसी सेना भी डिगा नहीं सकी थी।
आखिर गीता की ख्वाहिशें क्या थी जिसके लिए वह समाज से पंगा लेने पर उतारू हो गई थी।
गीता ने टाटा ट्रस्ट के धानी प्रोजेक्ट की ओर से अलवर में शुरू किए गए सखी कार्यक्रम के बारे में सुना। यह प्रोजेक्ट महिलाओं को डेयरी फार्मिंग के गुर सिखा रखा था। गीता के घर में एक भैंस थी इसलिए उसे लगा कि शायद यह काम वह आसानी से सीख लेगी।
कभी रुपयों की मोहताज, आज 1.5 लाख रुपया महीना कमा रही है
गीता देवी केवल 15 साल की थी, जब उसकी शादी हो गई। ससुराल पहुंची, तो देखा कि बाजरे, सरसों और गेहूं की खेती से बमुश्किल पूरे परिवार का खर्च निकलता है। दो बच्चे होने के बाद उनकी परवरिश का खर्च बढ़ गया, उसे लगा कि इस तंगहाली से बात नहीं बनेगी। उसे अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूल में दाखिला कराना था, रसोई के सभी डिब्बों को जरूरत की चीजों से भरना था, बूढ़े सास–ससुर की बीमारी का खर्चा भी उठाना था और पति की मदद भी करनी थी। उसने डेयरी फार्मिंग से शुरू की।
खुद में सिमटकर रहने वाली गीता, सखी से जुड़ने के बाद अपने जैसी ढेरों महिलाओं और पुरुषों को देखा। डेयरी फार्मिंग के प्रशिक्षण के दौरान लोगों से घुलने-मिलने से आत्मविश्वास भी बढ़ा
चंद रुपए कमाने वाली आज 1 लाख 20 हजार रुपया कमा रही
आज महीने का 1 लाख 20 हजार कमाने वाली गीता बताती हैं कि जब वह डेयरी फॉर्म का प्रशिक्षण लेने जाती थी, तो आसपास के लोगों ने बातें बनानी शुरू की। कुछ लोग कहते थे कि मुझे रोज-रोज कौन लेने आता है, मैं किसके साथ बाइक पर बैठकर चली जाती है? पता नहीं पैसे के लोभ की वजह से कहां जाती है?
जितने लोग थे उतनी ही बातें होती थी लेकिन पति ने कभी नहीं टोका कि कहां और किसके साथ जा रही हूं। कम उम्र में शादी हो जाने के बाद मैं जल्दी ही दो बच्चों की मां बन गई। चहकने वाली मैं अपनी जिम्मेदारियों की वजह से शांत हो गई।
सखी से जुड़ने वाली हर महिला की एक कहानी है। कोई इंटर पास है, तो किसी ने पढ़ाई ही नहीं की, किसी का पति इस दुनिया में नहीं, तो किसी का पति शराबी। ऐसी बदतर स्थितियों में गीता जैसी कई औरतें अपनी किस्मत खुद लिखने निकलीं। इनको देखने के बाद गीता में और जोश आ गया था।
दूसरों के गहने-साड़ी देखकर अब जी नहीं तरसता
गीता बताती हैं कि गांव की दूसरी औरतों की तरह वह दूसरों से बात करने में झिझकती थी। लेकिन सखी से जुड़ने के बाद वह खुलने और खिलने लगी, अपने मन की बातें करने लगी। गीता बताती है कि एक समय था जब वह पड़ोस की महिलाओं को देखकर यह साेचती थी कि पता नहीं उसकी किस्मत में कब अच्छे कपड़े और गहने होंगे।
अब हंसते हुए कहती हैं, “मेरे पास अब ऐसी चीजों की कमी नहीं। मेरे बैंक में भी पैसे हैं। मैं अपने बच्चाें को अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ा रही हूं। अब मेरा अपना डेयरी फार्म है।”
आज जुल्फीना हंसते हुए बताती हैं कि आज उनके पास शिक्षा है, गहना है और पैसा है।
दूध बेचकर बीएड किया और झुमके बनाए जुल्फीना बानो ने
सखी की एक और सखी जुल्फीना ने बीएड कर रखा है, वह बताती हैं कि उनके परिवार ने बीएड का खर्च उठाने से मना कर दिया था क्योंकि खेती की आमदनी से घर का खर्च उठाना ही मुश्किल था लेकिन डेयरी फार्मिंग शुरू करने के बाद उनका बीएड करने का सपना पूरा हुआ। आज वह गर्व से बताती हैं कि मेरी शादी तीसरे क्लास में हो गई थी लेकिन पढ़ाई में मेरी बहुत दिलचस्पी थी इसलिए मैंने बीए तक पढ़ाई की।
डेयरी शुरू करने के बाद जब उनके पैसे आने लगे, तो उन्होंने दूध बेचकर बीएड की पढ़ाई की। मैं इस बात में गर्व महसूस करती हूं कि मैं अपनी कमाई से घर की किस्त भी भर रही हूं और पढ़ाई भी पूरी की है।
अलवर की मंजीत कौर बताती हैं कि पति के मृत्यु के बाद लगा कि सारी दुनिया ही ठहर गई। पति के पीछे चार बच्चों का भविष्य मुझे डराने लगा था। उस समय घर की माली हालत भी खराब थी। मैंने थोड़े से रुपए के लिए भी काम किया।
पति नहीं रहे, लेकिन बहादुरी से कठिनाइयों को सहा और बच्चों का सहारा बनीं मंजीत कौर
पांच साल पहले डेयरी फार्मिंग मंजीत का बड़ा सहारा बन कर उभरी। वे कहती हैं, डेयरी की कमाई से मैंने दो बेटियों की शादी और दो बेटों को पढ़ा रही हूं। एक बेटा बीएससी फाइनर ईयर में है और आईटीआई कर रहा है। शादी के पहले बेटियों को नर्सिंग की पढ़ाई भी कराई।
मंजीत की शादी 20 साल में हो गई थी। इसके बाद कुछ ही सालों में एक–एक करके 4 बच्चों का जन्म हो गया। जिम्मेदारियां पहले से बढ़ती जा रही थीं और घर की बदहाली दूर नहीं हुई। किसी समय 300 रुपए की नौकरी करने वाली मंजीत आज 50 हजार रुपए कमा रही हैं।
दूध की शुद्धता की जांच करती हुई महिलाएं। प्रशिक्षण में डेयरी फार्मिंग की सारी बारीकियों को समझाया जाता है।
क्या है धानी और सखी, यह किस तरह से महिलाओं को डेयरी फार्मिंग से जोड़कर उनको उद्यमी बनाने की कोशिश कर रहा है, जानें –
पंजाब के रीजनल मैनेजर बलजिंदर सैनी के अनुसार, इसकी शुरुआत के 5 सालों बाद महिला सशक्तिकरण साफ नजर आने लगा हैं, कंपनी को चलाने का पूरा ओनरशिप महिलाओं के हाथ में है, अब वह खुद ही अपने पैसों की मालकिन हैं ।पंजाब और हरियाणा में चल रही मिल्क प्रोड्यूसर कंपनी रुहानी को छोड़ दिया जाए, तो बाकी में केवल महिलाएं ही हैं।
सखी एक एमपीसी है, उदयपुर में आशा, पंजाब में रुहानी और श्वेतधारा के नाम से कई एमपीसी चलाई जा रही हैं। गीता, जुल्फीना जैसी सैकड़ों महिलाएं धानी के सखी प्रोजेक्ट से जुड़कर अपने पैरों पर खड़ी हो चुकी हैं।
टाटा ट्रस्ट का धानी प्रोजेक्ट मिल्क प्रोड्यूसिंग कंपनीज (एमपीसी) बनाने में मदद करता है। महिलाओं को डेयरी फार्मिंग से जोड़ने के लिए धानी ने ही सखी की शुरुआत की।
टाटा ट्रस्ट के पंजाब के प्रादेशिक प्रबंधक बलजिंदर सैनी के मुताबिक, ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि के जरिए आमदनी आमतौर पर देर से आती है। किसानों के पास रेगुलर आमदनी नहीं होती। ऐसे में डेयरी फार्मिंग आमदनी का जरिया बन गया। पहले ये दूधियों का सहारा लेते थे, जो अपने हिसाब से दूध बेचने वालों का शोषण करते थे।
इसी वजह से धानी को अस्तित्व में लाया गया। इसके माध्यम से डेयरी फार्मर्स को दूध की क्वालिटी के हिसाब से कीमत अदा की जाती है, दस दिन के अंतराल पर पेमेंट आती है, पेमेंट सीधे महिलाओं के बैंक में आती है।